ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन ने निर्णय का किया स्वागत, पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में बताया महत्वपूर्ण फैसला
प्रयागराज/लखनऊ, 23 जुलाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ग्राम पंचायतों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, तो उसकी वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्तियां सीज करने वाला आदेश प्रभावहीन हो जाता है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने रिट-सी संख्या 20094/2026 (समरजीत सिंह यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) में 21 जुलाई 2026 को पारित आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता का प्रधान के रूप में कार्यकाल समाप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में उनकी वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्तियां सीज करने वाले आदेश का अब कोई विधिक प्रभाव नहीं रह जाता।
न्यायालय ने 25 मई 2026 एवं 29 मई 2026 के शासनादेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि नए पंचायत चुनाव होने तक कार्यकाल पूर्ण कर चुके प्रधान केवल प्रशासनिक कार्य करेंगे। यही व्यवस्था याचिकाकर्ता पर भी लागू होगी।
हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 95(1)(g) के अंतर्गत चल रही जांच इस आदेश से प्रभावित नहीं होगी। याचिकाकर्ता जांच के दौरान कानून एवं तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखने तथा आवश्यक विधिक आपत्तियां उठाने के लिए स्वतंत्र रहेगा। इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
इस निर्णय का स्वागत करते हुए ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि यह फैसला पंचायत प्रतिनिधियों के वैधानिक अधिकारों एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने वाला है। उन्होंने कहा कि संगठन लंबे समय से पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत है और उच्च न्यायालय का यह निर्णय प्रदेश के हजारों ग्राम प्रधानों एवं पंचायत प्रतिनिधियों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि संगठन पंचायतों की स्वायत्तता, पारदर्शिता तथा प्रतिनिधियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे भी निरंतर प्रयास करता रहेगा।
