मेरे प्रिय बेटे नक्षत्र,
आज तुम्हारी पहली सोलो फ्लाइट ने मेरे हृदय को अपार गर्व, आनंद और भावनाओं से भर दिया है। एक पिता के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है कि जिस बेटे की उँगली पकड़कर उसने उसे चलना सिखाया था, वही आज अपने आत्मविश्वास, अनुशासन और अथक परिश्रम के बल पर खुले आकाश में पहली स्वतंत्र उड़ान भर रहा है।
यह केवल तुम्हारी पहली उड़ान नहीं, बल्कि तुम्हारे सपनों, संघर्ष, समर्पण और अटूट विश्वास की पहली स्वर्णिम विजय है। आज ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो तुम्हारे साथ-साथ मेरे सपनों ने भी पंख लगा लिए हों। तुम्हारी इस उपलब्धि ने मेरे जीवन के उन अनगिनत विश्वासों को साकार कर दिया है, जिन्हें मैंने तुम्हारे बचपन से अपने हृदय में संजोए रखा था।

बेटे, जीवन में जितनी भी ऊँचाइयाँ प्राप्त करना, अपने संस्कार, विनम्रता और मानवीय संवेदनाओं को कभी मत छोड़ना। याद रखना, आकाश की ऊँचाई से कहीं अधिक मूल्यवान मनुष्य के चरित्र की ऊँचाई होती है।
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारी हर उड़ान सुरक्षित रहे, हर चुनौती तुम्हें और अधिक सशक्त बनाए तथा तुम्हारा हर सपना सफलता में परिवर्तित हो। तुम अपने कर्म, व्यक्तित्व और उत्कृष्टता से केवल परिवार ही नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र का भी गौरव बढ़ाओ।

आज मेरी आँखों में जो आँसू हैं, वे किसी चिंता के नहीं, बल्कि उस अनमोल गर्व के हैं, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरा बेटा केवल आसमान में नहीं उड़ा है, उसने अपने पिता का मस्तक भी गर्व से और ऊँचा कर दिया है।
उड़ते रहो, बेटा… लेकिन अपने संस्कारों की धरती से हमेशा जुड़े रहना। यही तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान होगी और यही तुम्हारी सबसे ऊँची उड़ान भी।
ईश्वर तुम्हें सदैव स्वस्थ, सुरक्षित, सफल और यशस्वी रखे।
अपार स्नेह, असीम आशीर्वाद और अटूट विश्वास के साथ।
— तुम्हारा पिता
विवेक चन्द्र अवस्थी
