राष्ट्रकवि दिनकर : शब्दों से राष्ट्रचेतना तक, आज भी प्रासंगिक है उनकी लेखनी-विवेक चन्द्र अवस्थी
भारतीय साहित्य के आकाश में कुछ ऐसे सितारे हैं, जिनकी चमक समय बीतने के साथ कम नहीं होती, बल्कि प्रत्येक नई पीढ़ी के साथ और अधिक उज्ज्वल होती जाती है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भी ऐसे ही महान साहित्यकार थे, जिनकी लेखनी ने केवल कविता को समृद्ध नहीं किया, बल्कि देश के जनमानस में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान, संघर्ष और सामाजिक चेतना की भावना को भी मजबूत किया।

दिनकर जी को याद करते हुए मुझे यह अनुभव होता है कि उनकी कविताएं केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं। उनकी रचनाओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम है, अन्याय के विरुद्ध आवाज है, आत्मसम्मान की भावना है और समाज को बेहतर बनाने का आह्वान भी है।
इसीलिए दिनकर जी की जयंती मेरे लिए केवल एक महान कवि को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने समाज, अपने गांव और अपने राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को फिर से समझने का अवसर भी है।
दिनकर की लेखनी में दिखाई देता था भारत का स्वाभिमान
दिनकर जी का साहित्य उस भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है, जो संघर्षों के बीच भी अपने आत्मसम्मान को जीवित रखता है। उनकी ओजपूर्ण भाषा में जो ऊर्जा दिखाई देती है, वह आज भी पाठक के भीतर एक नई चेतना पैदा करती है।
मेरी दृष्टि में दिनकर जी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने साहित्य को समाज से अलग नहीं रखा। उनकी लेखनी आम आदमी की भावनाओं, संघर्षों और आकांक्षाओं से जुड़ी रही।
आज जब हम ग्रामीण भारत की बात करते हैं, गांवों के विकास की बात करते हैं और पंचायतीराज व्यवस्था को मजबूत करने की बात करते हैं, तब दिनकर जी के विचार और भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है
मैं लंबे समय से ग्रामीण समाज और पंचायतीराज व्यवस्था से जुड़ा हुआ हूं। गांवों के बीच काम करते हुए मैंने बहुत करीब से महसूस किया है कि भारत के विकास की वास्तविक तस्वीर गांवों के विकास से ही पूरी होगी।
हम बड़े शहरों के विकास की चर्चा तो बहुत करते हैं, लेकिन भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है। गांव का किसान, मजदूर, महिला, युवा और सामान्य ग्रामीण—यही हमारे राष्ट्र की वास्तविक शक्ति हैं।
मेरी कलम जब गांव की बात करती है तो मेरे सामने केवल सड़क, नाली, बिजली और पानी का प्रश्न नहीं होता। मेरे सामने एक ऐसा गांव होता है जहां सम्मान के साथ जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छता, सामाजिक समरसता और जनभागीदारी उपलब्ध हो।
यही वह सोच है, जिसे मैं दिनकर जी की राष्ट्रचेतना से जोड़कर देखता हूं।
पंचायत केवल विकास कार्यों की संस्था नहीं
मेरे विचार से पंचायत को केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने वाली संस्था मानना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है।
पंचायत गांव के लोकतंत्र की पहली पाठशाला है।
ग्राम सभा में जब सामान्य ग्रामीण अपनी बात रखता है, जब महिलाएं अपने गांव के विकास में भागीदारी करती हैं, जब युवा पंचायत के निर्णयों और विकास कार्यों में रुचि लेते हैं और जब पंचायत प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होकर काम करता है, तभी वास्तविक लोकतंत्र गांव तक पहुंचता है।
मेरी दृष्टि में यही वह भारत है, जिसकी कल्पना करते हुए हम ग्राम स्वराज और सशक्त पंचायतीराज की बात करते हैं।
दिनकर से प्रेरणा लेकर गांवों में नई चेतना की आवश्यकता
आज आवश्यकता केवल पंचायतों के विकास की नहीं, बल्कि पंचायतों में जागरूकता की भी है।
हमें ऐसी ग्राम सभाएं चाहिएं जहां लोग केवल उपस्थित न हों, बल्कि अपनी जिम्मेदारी को समझें।
हमें ऐसे युवा चाहिएं जो गांव छोड़ने के बजाय गांव के विकास की नई संभावनाएं तलाशें।
हमें ऐसी महिला नेतृत्व शक्ति चाहिए जो पंचायत के निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभाए।
हमें ऐसे पंचायत प्रतिनिधि चाहिएं जो पद को अधिकार नहीं, बल्कि जनसेवा का दायित्व समझें।
और हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें पंचायत के विकास कार्यों में पारदर्शिता और जनता की भागीदारी दोनों सुनिश्चित हों।
मुझे लगता है कि दिनकर जी की राष्ट्रचेतना को गांवों तक पहुंचाने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनके विचारों को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने सामाजिक जीवन और जनसेवा में उतारें।
युवा पीढ़ी को दिनकर को पढ़ना चाहिए
आज की युवा पीढ़ी तकनीक और डिजिटल दुनिया से तेजी से जुड़ रही है। यह अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ना भी उतना ही आवश्यक है।
मैं चाहता हूं कि हमारे गांवों के बच्चे और युवा दिनकर जी जैसे साहित्यकारों को पढ़ें। वे समझें कि राष्ट्रप्रेम केवल नारों में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने में भी है।
अपने गांव को स्वच्छ रखना, शिक्षा को बढ़ावा देना, जरूरतमंद की सहायता करना, महिलाओं का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा करना भी राष्ट्रसेवा का ही हिस्सा है।
मेरी कलम का संकल्प
मेरे लिए लेखनी केवल शब्द लिखने का माध्यम नहीं है। मेरी कोशिश रहती है कि मेरी कलम गांव की आवाज बने, पंचायत की बात करे और आम ग्रामीण की समस्याओं को समाज के सामने रखे।
दिनकर जी की जयंती पर मैं अपनी कलम के माध्यम से यही संकल्प दोहराना चाहता हूं कि ग्रामीण भारत की आवाज को मजबूती से सामने लाने और पंचायतीराज व्यवस्था को अधिक सशक्त, पारदर्शी एवं जनभागीदारी आधारित बनाने के प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए।
मैं मानता हूं कि जब गांव जागेगा, ग्राम सभा मजबूत होगी, पंचायत जवाबदेह बनेगी और युवा तथा महिलाएं विकास की मुख्यधारा में सक्रिय रूप से जुड़ेंगे, तभी सशक्त गांव से सशक्त भारत का सपना और मजबूत होगा।
दिनकर को सच्ची श्रद्धांजलि
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को याद करते हुए मेरी यही भावना है कि उनकी ओजस्वी लेखनी से हमें केवल प्रेरणा ही नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य का बोध भी प्राप्त करना चाहिए।
उनकी कविता में राष्ट्र था, समाज था, संघर्ष था और भविष्य के भारत का सपना था।
आज आवश्यकता है कि हम उस सपने को अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़ाएं।
मेरी दृष्टि में दिनकर जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके शब्दों की ऊर्जा को जनसेवा की शक्ति बनाएं, गांवों को सशक्त बनाएं और राष्ट्रनिर्माण में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाएं।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
— विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
