सांकेतिक भाषा समानता, सम्मान और संवाद का सशक्त माध्यम : विवेक चन्द्र अवस्थी
“सांकेतिक भाषा को बढ़ावा देना केवल दिव्यांगजनों के अधिकारों की बात नहीं, बल्कि समावेशी समाज के निर्माण की जिम्मेदारी है”
कानपुर। अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के अवसर पर ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि सांकेतिक भाषा उन लाखों लोगों के लिए अभिव्यक्ति, संवाद और आत्मसम्मान का महत्वपूर्ण माध्यम है, जो सुनने या बोलने में कठिनाई का सामना करते हैं। समाज में समान अवसर और सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए सांकेतिक भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।

मेरी कलम से— सांकेतिक भाषा केवल संवाद की एक पद्धति नहीं, बल्कि भावनाओं, विचारों और अधिकारों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। पंचायतों से लेकर विद्यालयों, स्वास्थ्य केंद्रों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक सेवाओं तक सांकेतिक भाषा को अधिक सुगम बनाया जाना चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति संवाद के अभाव में अपने अधिकारों और सुविधाओं से वंचित न रहे।
पंचायतों को बनाना होगा अधिक समावेशी
मेरी सोच है कि ग्रामीण भारत में स्थानीय स्वशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई ग्राम पंचायत है। ऐसे में पंचायत भवनों, ग्राम सभाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी को दिव्यांगजनों के लिए सुलभ बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। समावेशी पंचायत ही सशक्त पंचायत की आधारशिला है।
मेरे विचार में विद्यालयों और युवा पीढ़ी में सांकेतिक भाषा के प्रति रुचि एवं जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ डिजिटल माध्यमों में सांकेतिक भाषा की सुविधा उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है।
“हर व्यक्ति को अपनी बात कहने और सुने जाने का अधिकार”
मैं मानता हूँ कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी मानी जाएगी, जब विकास की मुख्यधारा में प्रत्येक व्यक्ति की समान भागीदारी सुनिश्चित हो। सांकेतिक भाषा के सम्मान और विस्तार से संवाद की दीवारें कम होंगी तथा समानता, संवेदनशीलता और सामाजिक सहभागिता को मजबूती मिलेगी।
अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर मेरा संदेश है कि हम सांकेतिक भाषा को समझने, सम्मान देने और इसके व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने का संकल्प लें, ताकि संवाद की कोई बाधा किसी व्यक्ति के अधिकारों और अवसरों के बीच दीवार न बने।
