जिन हाथों ने पीढ़ियां संवारीं, उन हाथों को सम्मान देना समाज का संस्कार और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है
मेरी कलम से —
विवेक चन्द्र अवस्थी
“राष्ट्रीय अध्यक्ष”
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
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कृतज्ञता का दिवस:-
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उन असंख्य जीवनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने अपने अनुभव, संघर्ष, त्याग और संस्कारों से समाज और राष्ट्र की नींव को मजबूत किया है। वरिष्ठ नागरिक हमारे परिवारों की स्मृति, समाज की चेतना और आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुभव का वह दीपक हैं, जिसकी रोशनी समय के साथ और गहरी होती जाती है।
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वरिष्ठ नागरिक :-अनुभव और स्मृतियों का जीवंत इतिहास
किसी घर की चौखट पर बैठा एक वृद्ध चेहरा केवल उम्र की कहानी नहीं कहता। उसकी आंखों में बीते हुए दशकों का इतिहास, माथे की झुर्रियों में संघर्ष की गाथा और मौन में जीवन के अनगिनत अनुभव छिपे होते हैं। जिन हाथों ने कभी बच्चों की उंगली पकड़कर उन्हें चलना सिखाया, खेतों में पसीना बहाया, परिवार को संभाला और समाज के निर्माण में योगदान दिया—उन्हीं हाथों को वृद्धावस्था में सहारे और सम्मान की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
इसी सच्चाई को मेरे छोटे से गांव मड़ेपुर की घटना और अधिक गहराई से समझाती है।

गांव के हमारे अति प्रिय 85 वर्षीय श्री महेन्द्र प्रताप अवस्थी जी हर शाम अपने घर के बाहर चबूतरे पर तखत में बैठते है । उनके एक बेटे का असमय निधन हो गया था और एक बेटे दिल्ली शहर में नौकरी करते है । एक दिन मैं स्वयं उनसे पूछ बैठे—“बाबा जी , आप रोज अकेले क्यों बैठते हैं?”
वे मुस्कुराए और धीमे स्वर में बोले—“मैं अकेला नहीं हूं बेटा, मैं बस इंतजार करता हूं कि कोई आकर मुझसे मेरे जमाने की बातें सुन ले।”
उनकी यह बात सुनकर वहां खड़े लोग कुछ पल के लिए मौन हो गए। उस दिन पहली बार गांव के युवाओं ने महसूस किया कि बुजुर्गों का अकेलापन केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी होता है।
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बदलती जीवनशैली और बढ़ता अकेलापन
आज बदलती जीवनशैली, एकल परिवारों और बढ़ती व्यस्तताओं के बीच वरिष्ठ नागरिकों का अकेलापन एक गंभीर सामाजिक प्रश्न बनता जा रहा है। हमें यह समझना होगा कि बुजुर्गों की आवश्यकता केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। उन्हें अपनापन चाहिए, संवाद चाहिए, सम्मान चाहिए और यह विश्वास चाहिए कि उनके जीवनभर के योगदान का समाज के पास मूल्य है।
एक और मार्मिक उदाहरण शहर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से जुड़ा है।
एक बुजुर्ग दंपति के दोनों बच्चे विदेश में बस गए थे। त्योहारों पर वीडियो कॉल तो होती थी, लेकिन घर की रसोई में अब पहले जैसी रौनक नहीं थी। एक दिन पड़ोस की एक छोटी बच्ची गलती से उनके घर आ गई और बोली—“दादी, आप अकेले क्यों रहते हो?”
दादी की आंखें भर आईं, उन्होंने बच्ची को गोद में लेकर कहा—“हम अकेले नहीं हैं, बस हमें सुनने वाला कोई नहीं है।”
उस दिन से वह बच्ची रोज कुछ देर उनके पास बैठने लगी। धीरे-धीरे वह घर फिर से हंसी से भरने लगा। यह घटना बताती है कि बुजुर्गों को सबसे अधिक आवश्यकता किसी बड़े सहारे की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अपनत्व के क्षणों की होती है।
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वरिष्ठ नागरिक : समाज की जीवंत विरासत
वरिष्ठ नागरिक समाज का भार नहीं, समाज की जीवंत विरासत हैं।
उनके पास वह अनुभव है, जो किसी पुस्तक में पूरी तरह नहीं मिलता। उन्होंने अभाव देखे हैं, संघर्ष झेले हैं, रिश्तों को निभाया है और समय के बदलते स्वरूप को अपनी आंखों से देखा है। इसलिए आधुनिक विकास की दौड़ में यदि हम उनके अनुभव को पीछे छोड़ देंगे तो हमारी प्रगति अधूरी रह जाएगी।
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ग्रामीण भारत में वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका
ग्रामीण भारत में वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पीढ़ियों को जोड़ने, सामाजिक समरसता बनाए रखने, लोक परंपराओं और संस्कारों को जीवित रखने में बुजुर्गों का योगदान अमूल्य है। पंचायतें यदि वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव को ग्राम विकास की योजना और सामाजिक निर्णयों से जोड़ें, तो गांवों के विकास को नई दिशा मिल सकती है।
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पंचायतीराज और वरिष्ठ नागरिकों की सहभागिता
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का मानना है कि पंचायतों को वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा और सहभागिता के लिए स्थानीय स्तर पर प्रभावी पहल करनी चाहिए। ग्राम पंचायतों में वरिष्ठ नागरिक संवाद, स्वास्थ्य एवं सम्मान कार्यक्रम, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी तथा जरूरतमंद बुजुर्गों तक सरकारी सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा सकते हैं।
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सम्मानजनक वृद्धावस्था : समाज की जिम्मेदारी
हमें ऐसा समाज बनाना है जहां वृद्धावस्था अकेलेपन का पर्याय न हो, बल्कि सम्मान और आत्मीयता का समय बने। जहां बुजुर्गों को यह महसूस न हो कि उनका समय समाप्त हो गया है, बल्कि यह विश्वास हो कि उनका अनुभव आज भी समाज के लिए उतना ही उपयोगी है।
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समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड
मेरी दृष्टि में किसी समाज की वास्तविक प्रगति केवल उसकी सड़कों, इमारतों और तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती। समाज की संवेदनशीलता इस बात से भी परखी जाती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
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संकल्प : साथ, सम्मान और संवाद
आइए, विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम केवल शुभकामनाएं न दें, बल्कि एक संकल्प लें—अपने घर के बुजुर्गों के साथ कुछ समय बैठेंगे, उनकी बातें सुनेंगे, उनके अनुभवों का सम्मान करेंगे और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करेंगे।
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निष्कर्ष : अनुभव ही भविष्य की नींव है
क्योंकि जिस समाज की जड़ें अपने बुजुर्गों के अनुभवों में मजबूत होती हैं, उसकी आने वाली पीढ़ियां अधिक सुरक्षित, संस्कारित और समृद्ध होती हैं।
वरिष्ठ नागरिक हमारे अतीत की स्मृति ही नहीं, वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की दिशा भी हैं। उनके सम्मान में झुकता हुआ सिर वास्तव में हमारी अपनी संस्कृति, अपने संस्कार और अपने भविष्य के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
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अंतिम संदेश
आइए, उम्र का सम्मान करें, अनुभव को प्रणाम करें और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और अपनत्व का उजाला भरें।
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर देश के समस्त वरिष्ठ नागरिकों को सादर नमन एवं हार्दिक शुभकामनाएं।
