गाँव, किसान और आमजन के जीवन-संघर्ष को अमर स्वर देने वाली उनकी लेखनी आज भी समाज को न्याय, संवेदना और मानवीय मूल्यों का मार्ग दिखाती है।
जयंती विशेष लेख
लखनऊ, 31 जुलाई।
हिन्दी एवं उर्दू साहित्य के अमर कथाकार, महान उपन्यासकार और सामाजिक चेतना के प्रखर संवाहक मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि प्रेमचंद केवल साहित्यकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के यथार्थ के ऐसे सशक्त प्रवक्ता थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से शोषित, वंचित, किसान, मजदूर और ग्रामीण भारत के जीवन-संघर्ष को विश्व पटल पर स्थापित किया।

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके जीवनकाल में था। उनकी रचनाएँ सामाजिक विषमता, आर्थिक असमानता, जातिगत भेदभाव, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा जीवंत दस्तावेज़ हैं, जो प्रत्येक पीढ़ी को समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का बोध कराती हैं।
विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ जैसी कालजयी कृतियों में प्रेमचंद ने भारतीय समाज के वास्तविक स्वरूप को अत्यंत मार्मिकता और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया। उनके पात्र केवल कहानी के पात्र नहीं, बल्कि भारतीय जनजीवन की जीवंत तस्वीर हैं, जिनमें संघर्ष, आत्मसम्मान, न्याय और परिवर्तन की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य हमें यह संदेश देता है कि किसी भी राष्ट्र का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब गाँव सशक्त हों, किसान सम्मानित हों, श्रमिक सुरक्षित हों और समाज में न्याय एवं समान अवसर सुनिश्चित किए जाएँ। आज जब भारत आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब प्रेमचंद के विचार ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि पंचायतें लोकतंत्र की आधारशिला हैं और प्रेमचंद का साहित्य ग्राम जीवन की समस्याओं, संभावनाओं तथा मानवीय संवेदनाओं को समझने की प्रेरणा देता है। यदि पंचायत प्रतिनिधि, युवा और समाजसेवी उनके विचारों को आत्मसात करें, तो ग्रामीण भारत के समग्र विकास का मार्ग और अधिक सशक्त हो सकता है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक और डिजिटल युग में भी साहित्य से जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है। प्रेमचंद की रचनाएँ युवाओं में संवेदनशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिकता, राष्ट्रप्रेम और जनसेवा की भावना को सुदृढ़ करती हैं। उनका साहित्य केवल पढ़ने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का संदेश देता है।
अंत में विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन, समाज और सार्वजनिक कार्यों में अपनाएँ तथा एक ऐसे भारत के निर्माण में योगदान दें, जहाँ न्याय, समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक समरसता सर्वोच्च मूल्य हों।
“मुंशी प्रेमचंद की लेखनी ने भारतीय समाज को विचारों की ऐसी अमूल्य धरोहर दी है, जो सदैव आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।”
