‘करो या मरो’ की वह अमर पुकार, जिसने करोड़ों भारतीयों के भीतर स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी
— विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
कानपुर। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 8 अगस्त 1942 का दिन उस निर्णायक घड़ी के रूप में दर्ज है, जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अंतिम बड़े जनआंदोलन का शंखनाद हुआ। मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ और देशवासियों को ‘करो या मरो’ का मंत्र मिला। इसके साथ ही स्वतंत्रता की आकांक्षा जन-जन के संकल्प में बदल गई।
भारत छोड़ो आंदोलन महज एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था। यह भारत के आत्मसम्मान, स्वाधीनता और अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करने के अधिकार की सामूहिक हुंकार थी। आंदोलन की घोषणा के बाद अंग्रेजी सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं, लेकिन दमन भी देशवासियों के उत्साह को नहीं रोक सका। विद्यार्थी, किसान, श्रमिक, महिलाएं और युवा बड़ी संख्या में इस संघर्ष से जुड़े।
स्वतंत्रता आंदोलन की वास्तविक शक्ति भारत के गांवों में भी दिखाई दी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने संदेश पहुंचाने, जनजागरण करने और आंदोलन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव-गांव में जगी राष्ट्रभक्ति की चेतना ने भारत छोड़ो आंदोलन को व्यापक जनांदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
आजादी की लड़ाई में गांवों के योगदान को स्मरण करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती गांवों की मजबूती से जुड़ी है। ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की पहली पाठशाला हैं। उन्हें अधिकार, संसाधन और जिम्मेदारी देकर ही ग्रामीण भारत को अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी सीख एकता, साहस, त्याग और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की है। आज चुनौतियां भले ही अलग हों, लेकिन उनसे मुकाबला करने के लिए उसी सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है। अशिक्षा, बेरोजगारी, ग्रामीण पिछड़ापन, सामाजिक असमानता और विकास की चुनौतियों से आगे बढ़ने के लिए सरकार के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
भारत छोड़ो आंदोलन के सेनानियों ने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र भारत नहीं था। वह ऐसा भारत था जहां प्रत्येक नागरिक को सम्मान, न्याय और समान अवसर मिले; गांव समृद्ध हों; युवा आगे बढ़ें; महिलाएं सशक्त हों और लोकतंत्र की जड़ें समाज के अंतिम व्यक्ति तक मजबूत हों।
आज भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति में हमें केवल इतिहास को याद नहीं करना है, बल्कि उसके मूल संदेश को अपने जीवन और कर्म में उतारना है। जिन वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उनके सपनों का भारत बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
‘करो या मरो’ की वह ऐतिहासिक पुकार आज भी हमें राष्ट्रहित में आगे बढ़ने, एकजुट रहने और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है। स्वतंत्रता केवल हमारा अधिकार नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित और सार्थक बनाए रखना हमारा दायित्व भी है।
भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले सभी ज्ञात-अज्ञात अमर सेनानियों को शत-शत नमन। उनके त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर गाथा सदैव राष्ट्र की नई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहे।
वंदे मातरम्। 🇮🇳
