शिक्षाविद् श्रद्धेय पूज्य बाबू जी श्री बद्री प्रसाद अवस्थी की जयंती एवं 20वीं पुण्यतिथि पर नि:शब्द अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि…के साथ कोटिशः नमन …

लखनऊ। जीवन में यदि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व, प्रतिभा, संस्कार और जीवन-दर्शन ने मुझे सबसे गहरे रूप से प्रभावित किया है, तो वह मेरे परम पूजनीय बाबू जी, शिक्षाविद् श्रद्धेय श्री बद्री प्रसाद अवस्थी जी हैं। आज उनकी जयंती और 20वीं पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करते हुए मन भावुक हो उठता है। 2 सितंबर 2006 को उनके आकस्मिक निधन से जीवन में जो शून्य उत्पन्न हुआ, उसकी अनुभूति आज भी उतनी ही गहरी है।

विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि किसी के लिए यह एक सामान्य सहज पितृ प्रेम हो सकता है, लेकिन मेरे लिए बाबू जी केवल पिता नहीं, बल्कि मेरे प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक और जीवन के सबसे बड़े आदर्श थे। पुत्र को पिता की अनुकृति कहा जाता है और मुझे सदैव इस बात का गर्व रहेगा कि मैं उनका बेटा हूं।

उन्होंने कहा कि बाबू जी का व्यक्तित्व शिक्षा, सादगी, सेवा, सत्य, अनुशासन और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम था। उनकी वाणी में मर्यादा, आचरण में अनुशासन, हृदय में करुणा और दृष्टि में दूरदर्शिता थी। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षा और समाज के उत्थान के लिए समर्पित किया। उनका मानना था कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, चरित्र और कर्मों से होती है।
विवेक चन्द्र अवस्थी ने भावुक होकर कहा कि समय के साथ जीवन के जख्म भले ही कुछ भर जाते हैं, लेकिन साथ बिताए हुए कुछ पल कभी भुलाए नहीं जा सकते। बाबू जी की एक तस्वीर आज भी मेरे हृदय में बसी है, जो हर कठिन समय में मुझे जीने और आगे बढ़ने का हौसला देती है।

उन्होंने कहा कि बाबू जी के साथ बिताया गया हर पल आज भी मेरे लिए प्रेरणा है। जब भी जीवन में कोई गंभीर समस्या या विषम परिस्थिति सामने आती है, तो ऐसा लगता है जैसे बाबू जी का मार्गदर्शन अदृश्य रूप से मेरे साथ खड़ा है। उनकी सीख, उनका अनुशासन और उनके संस्कार मुझे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मजबूत बने रहने की शक्ति देते हैं।

उन्होंने बताया कि बाबू जी को उन्होंने उनकी मृत्यु के बाद भी अपनी आत्मा में जीवंत रखा है। उनकी स्मृति और उनके आशीर्वाद को सदैव अपने साथ महसूस करने के लिए पैतृक गांव में उनकी प्रतिमा भी स्थापित कराई गई है। यह प्रतिमा उनके लिए केवल स्मृति-चिह्न नहीं, बल्कि बाबू जी की जीवंत उपस्थिति और उनके आदर्शों की निरंतर प्रेरणा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जीवन की हर विषम परिस्थिति में बाबू जी का आशीर्वाद और मार्गदर्शन उनके साथ होने का अहसास कराता है। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं उनका बेटा हूं और मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि उनके द्वारा दिए गए संस्कारों और मूल्यों को अपने जीवन में निरंतर जीवित रखूं।
विवेक चन्द्र अवस्थी ने अपने भाइयों, परिजनों और नई पीढ़ी से भी आह्वान किया कि वे बाबू जी के जीवन-मूल्यों और आदर्शों को आत्मसात करने का प्रयास करें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

उन्होंने कहा कि बाबू जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संस्कार, विचार और स्मृतियां आज भी हमारे जीवन को दिशा दे रही हैं। उनका जीवन हमारे लिए एक ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसकी रोशनी आने वाली पीढ़ियों का मार्ग भी आलोकित करती रहेगी।
परम पूजनीय बाबू जी की जयंती एवं 20वीं पुण्यतिथि पर विवेक चन्द्र अवस्थी एवं समस्त अवस्थी परिवार ने उनके श्रीचरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उन्हें कोटि-कोटि नमन किया।
श्रद्धेय बाबू जी अमर रहें—हमारी स्मृतियों में, हमारे संस्कारों में और हमारे सत्कर्मों में।
