भगवान बलराम को समर्पित पावन पर्व पर ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन ने दी देश-प्रदेश के ग्रामीण जनमानस को शुभकामनाएं
लखनऊ। भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलराम को समर्पित पावन पर्व हल षष्ठी (ललही छठ) के अवसर पर ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन की ओर से देश-प्रदेश के समस्त ग्रामीण जनमानस, मातृशक्ति, अन्नदाता किसानों और पंचायत प्रतिनिधियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी गईं।
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि सनातन परंपरा में हल षष्ठी का विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। भगवान बलराम जी का प्रमुख आयुध हल है। यही कारण है कि यह पर्व भारतीय कृषि संस्कृति, धरती, अन्न और श्रम के प्रति सम्मान की भावना को भी अभिव्यक्त करता है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत की जीवनशैली में धार्मिक आस्था और कृषि संस्कृति सदियों से एक-दूसरे से जुड़ी रही हैं। हल षष्ठी इसी गौरवशाली परंपरा और ग्राम्य जीवन के मूल संस्कारों का प्रतीक है। इस दिन माताएं श्रद्धा और निष्ठा के साथ व्रत रखकर अपनी संतानों के स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
श्री अवस्थी ने कहा कि भगवान बलराम शक्ति, श्रम, कृषि और धरती से जुड़े जीवन-मूल्यों के प्रतीक हैं। उनका हल केवल कृषि का उपकरण नहीं, बल्कि अन्न उत्पादन और किसान के अथक परिश्रम की महत्ता का प्रतीक भी माना जाता है। किसान के श्रम और पसीने से ही समाज के लिए अन्न तथा जीवन का आधार तैयार होता है।
उन्होंने कहा कि हमारे पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक एकता, पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी को अपनी सनातन परंपराओं, लोक आस्थाओं और ग्राम्य संस्कृति के मूल भाव से परिचित कराया जाए, ताकि भारत की समृद्ध ग्रामीण संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।

ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन की ओर से कामना की गई कि भगवान बलराम जी की कृपा से देश के सभी गांवों में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली का वास हो। खेत-खलिहान अन्न-धन से परिपूर्ण रहें तथा प्रत्येक परिवार में स्वास्थ्य, सद्भाव और मंगल बना रहे।
संगठन ने ग्रामीण जनमानस से आह्वान किया कि हल षष्ठी के पावन अवसर पर अन्नदाता किसान, धरती माता, श्रम और भारतीय ग्राम्य संस्कृति के सम्मान का संकल्प लें तथा अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को श्रद्धा, विश्वास और गौरव के साथ आगे बढ़ाएं।
