“दोनों की भूमिका और कार्यप्रणाली अलग-अलग — ग्राम पंचायत में अधिकार, दायित्व और निर्धारित नियमों की मर्यादा का पालन जरूरी”

लखनऊ। ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि ग्राम पंचायत की व्यवस्था को समझने के लिए ग्राम प्रधान और पंचायत प्रशासक की भूमिका के बीच स्पष्ट अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। दोनों ग्राम पंचायत से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते हैं, लेकिन उनकी संवैधानिक एवं प्रशासनिक भूमिका एक जैसी नहीं होती।
उन्होंने कहा कि ग्राम प्रधान जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि होता है। वह गांव की जनता की अपेक्षाओं, समस्याओं और आवश्यकताओं को पंचायत के माध्यम से सामने रखने तथा स्थानीय विकास की दिशा में नेतृत्व प्रदान करने की भूमिका निभाता है। ग्राम प्रधान का संबंध सीधे ग्रामीण जनता और स्थानीय लोकतंत्र से होता है।

वहीं पंचायत प्रशासक का दायित्व प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायत के कार्यों का संचालन करना होता है।प्रशासक को शासन एवं प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों, आदेशों, वित्तीय प्रक्रियाओं और प्रशासनिक निर्देशों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। उसकी भूमिका निर्वाचित जनप्रतिनिधि की भूमिका के समान नहीं होती।
श्री अवस्थी ने कहा कि दोनों के बीच इस अंतर को समझना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जनप्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दायित्व दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। ग्राम प्रधान जनता की आकांक्षाओं और स्थानीय आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रशासक निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार पंचायत के कार्यों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचायत प्रशासक को ग्राम प्रधान के निर्वाचित जनप्रतिनिधित्व की भूमिका का स्थानापन्न समझना उचित नहीं है, और न ही प्रशासनिक दायित्वों को जनप्रतिनिधि की भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। प्रत्येक पद की अपनी निर्धारित भूमिका, जिम्मेदारी और कार्यप्रणाली है तथा उसी मर्यादा में कार्य होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत में व्यवस्था चाहे निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित हो या किसी प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत, ग्रामीण जनता के हित, पारदर्शिता, जवाबदेही और विकास कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
श्री अवस्थी ने कहा, “ग्राम प्रधान गांव की जनता के विश्वास से चुना गया नेतृत्व है और पंचायत प्रशासक प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने वाला अधिकारी/दायित्वधारी है। दोनों की गरिमा और भूमिका का सम्मान करते हुए यदि निर्धारित अधिकारों एवं दायित्वों के अनुरूप कार्य किया जाए, तो पंचायत व्यवस्था अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनहितकारी बन सकती है।”
उन्होंने कहा कि एक ग्राम पंचायत की पहचान केवल सरकारी योजनाओं या विकास बजट से नहीं होती, बल्कि उसके नेतृत्व की नीयत, प्रशासन की निष्पक्षता और ग्रामीणों की सहभागिता से होती है। जब जनप्रतिनिधित्व और प्रशासन अपने-अपने दायित्वों की मर्यादा में रहकर सामूहिक रूप से कार्य करते हैं, तभी गांव की तस्वीर और तकदीर बदलने का वास्तविक मार्ग तैयार होता है।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन ने सभी संबंधित पक्षों से अपील की कि ग्राम पंचायतों में पद और व्यवस्था की मर्यादा का सम्मान करते हुए जनहित को केंद्र में रखा जाए तथा ग्रामीण लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच स्वस्थ समन्वय स्थापित किया जाए।
