विशेष लेख | पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि…
✍️ विवेक चन्द्र अवस्थी
“राष्ट्रीय अध्यक्ष”
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
“सशक्त संगठन • सशक्त पंचायत • सतत् विकास”
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न एवं युगद्रष्टा राजनेता श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है।
अटल जी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसमें विचारों की दृढ़ता के साथ संवाद, राजनीतिक मतभेदों के साथ पारस्परिक सम्मान और सत्ता के साथ राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा। उनका सार्वजनिक जीवन लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रनिष्ठा, सुशासन, मानवीय संवेदना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का अद्भुत समन्वय था।
25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी जी ने विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रसेवा का मार्ग अपनाया। उन्होंने दशकों तक भारतीय संसद में सक्रिय भूमिका निभाई और देश के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री तथा विपक्ष के नेता जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। अपने दीर्घ सार्वजनिक जीवन में उन्होंने भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा प्रदान की।
सुशासन और राष्ट्रनिर्माण के प्रखर प्रतीक
अटल जी का नेतृत्व ऐसे दौर में उभरा, जब भारत को राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक प्रगति और वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता थी। उन्होंने गठबंधन राजनीति को केवल राजनीतिक विवशता नहीं बनने दिया, बल्कि संवाद, सहमति और लोकतांत्रिक सहयोग की शक्ति में परिवर्तित किया।
उनके नेतृत्व में भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आधारभूत संरचना, दूरसंचार, ग्रामीण संपर्क और विकास के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की। वर्ष 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों ने भारत की सामरिक क्षमता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को विश्व के सामने दृढ़ता से स्थापित किया।
दृढ़ राष्ट्रनीति के साथ शांति और संवाद का संदेश
अटल जी की राष्ट्रनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय स्वाभिमान सर्वोपरि थे, किंतु उनकी राजनीति का अंतिम उद्देश्य शांति और स्थायी संवाद ही था।
वे मानते थे कि एक सशक्त राष्ट्र वही है जो अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहते हुए विश्व में शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना को भी आगे बढ़ाए। उनकी राजनीति में दृढ़ता थी, परंतु उसमें संवेदना का अभाव नहीं था; उनके निर्णयों में राष्ट्रहित था, परंतु उसमें संवाद के द्वार सदैव खुले रहे।
लोकतंत्र में संवाद और मर्यादा की मिसाल
अटल बिहारी वाजपेयी जी की सबसे विशिष्ट पहचान उनकी लोकतांत्रिक उदारता और राजनीतिक मर्यादा थी। वे मतभेद को मनभेद में बदलने के पक्षधर नहीं थे।
उनकी वाणी में ओज था, तर्क में दृढ़ता थी और अभिव्यक्ति में शालीनता। वे विपक्ष के विचारों को सुनने और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बनाए रखने में विश्वास रखते थे। यही कारण है कि उन्हें राजनीतिक सीमाओं से परे व्यापक सम्मान और स्वीकार्यता प्राप्त हुई।
आज के सार्वजनिक जीवन में जब संवाद और सहमति की आवश्यकता और अधिक महसूस की जा रही है, तब अटल जी की राजनीतिक शैली लोकतंत्र के लिए एक प्रेरणादायी आदर्श प्रस्तुत करती है।
राजनेता के साथ संवेदनशील कवि और राष्ट्रपुरुष
अटल जी की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं थी। वे एक संवेदनशील कवि, प्रभावशाली वक्ता और साहित्यप्रेमी व्यक्तित्व थे।
उनकी कविताओं और वक्तव्यों में राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम, संघर्षों के बीच आशा, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और आगे बढ़ने का अदम्य संकल्प दिखाई देता है।
उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि सार्वजनिक जीवन में विचारों की ऊंचाई और संवेदनाओं की गहराई एक साथ कायम रखी जा सकती है।
पंचायत और ग्रामीण भारत के लिए अटल जी की प्रासंगिकता
भारत के समग्र विकास की कल्पना गांवों के विकास के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। अटल जी के राष्ट्रनिर्माण के व्यापक दृष्टिकोण में ग्रामीण भारत को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण था।
ग्रामीण संपर्क, सड़क, संचार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की दिशा में उनके कार्यों ने गांवों को देश की विकास यात्रा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज जब भारत विकसित राष्ट्र के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाना, ग्रामीण नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना और विकास के लाभों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना अटल जी के जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
अटल जी की विरासत : आने वाली पीढ़ियों के लिए अमर प्रेरणा
16 अगस्त 2018 को अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन से भारतीय राजनीति के एक युग का अवसान हुआ, लेकिन उनके विचारों और आदर्शों की प्रासंगिकता आज भी अक्षुण्ण है।
उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान राजनेता को स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को सार्वजनिक जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लेने का दिन भी है।
अटल जी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सत्ता स्वयं में साध्य नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम है। राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थ का क्षेत्र नहीं, बल्कि जनकल्याण और राष्ट्रनिर्माण का दायित्व है। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि संवाद, सहमति, संवैधानिक मर्यादा और जनभागीदारी से उसकी वास्तविक शक्ति निर्मित होती है।
भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाना उनके असाधारण योगदान और राष्ट्रसेवा की व्यापक स्वीकार्यता का प्रतीक है।
पुण्यतिथि पर संकल्प और शत-शत नमन
अटल जी आज हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनके विचार, उनकी वाणी, उनकी कविताएं, उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि और राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण सदैव भारतवासियों को प्रेरित करता रहेगा।
उनकी पुण्यतिथि पर हम संकल्प लें कि लोकतंत्र की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता, ग्राम स्वराज, ग्रामीण विकास, जनभागीदारी, सुशासन तथा अंतिम व्यक्ति के कल्याण के मूल्यों को मजबूत करने में अपना योगदान देंगे।
श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।
जय हिंद।
जय भारत।
