– विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
सनातन वैदिक परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, उपासना, व्रत, जप, तप एवं आत्मशुद्धि के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी श्रद्धा, भक्ति, संयम और संतान के मंगल की कामना से जुड़ी एक विशिष्ट धार्मिक तिथि है।
श्रावण मास स्वयं भगवान शिव की आराधना, प्रकृति के नवजीवन और आध्यात्मिक चेतना का पावन काल माना जाता है। इसी पुण्यकाल में आने वाली पुत्रदा एकादशी भगवान श्रीविष्णु की शरण में जाकर परिवार, संतान और समस्त लोक के कल्याण की मंगलकामना करने का अवसर प्रदान करती है।
सनातन धर्म में संतान को केवल वंशवृद्धि का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि उसे परिवार के संस्कारों, कुल-परंपराओं और धर्ममूल्यों का संवाहक माना गया है। इसी भावभूमि में पुत्रदा एकादशी का विशेष महत्व स्थापित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस पावन एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत एवं भगवान श्रीहरि का विधिवत पूजन करने से संतान-सुख तथा संतान के आरोग्य, दीर्घायु, सद्बुद्धि और मंगलमय जीवन की कामना पूर्ण होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
एकादशी व्रत का वास्तविक स्वरूप केवल अन्न का त्याग नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता है। व्रत का उद्देश्य मनुष्य को विषय-विकारों से दूर कर आत्मसंयम, सदाचार और ईश्वर-स्मरण की ओर अग्रसर करना है। इस दिन भगवान श्रीहरि के नाम का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भगवद्-कथा का श्रवण, ध्यान एवं सात्त्विक जीवन का पालन विशेष पुण्यकारी माना गया है।
भगवान श्रीविष्णु जगत के पालनकर्ता और धर्म की स्थापना करने वाले परम पुरुष के रूप में सनातन परंपरा में पूजित हैं। उनके श्रीचरणों में तुलसीदल अर्पित करना अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर संकल्पपूर्वक व्रत रखते हैं तथा भगवान श्रीहरि और माता लक्ष्मी का पूजन करते हैं।
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप मन को एकाग्र करता है और साधक को भगवान की शरणागति का भाव प्रदान करता है। एकादशी का यह आध्यात्मिक अनुशासन मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि संतोष, सदाचार, श्रद्धा और आत्मिक शांति में निहित है।
पुत्रदा एकादशी का सबसे सुंदर संदेश संतान के कल्याण और संस्कार से जुड़ा है। आज के समय में माता-पिता का दायित्व केवल अपनी संतान को आधुनिक शिक्षा एवं सुविधाएं उपलब्ध कराना ही नहीं है, बल्कि उनमें सत्य, करुणा, अनुशासन, विनम्रता, राष्ट्रप्रेम और समाजसेवा की भावना विकसित करना भी है। संस्कारित संतति ही परिवार, समाज और राष्ट्र की वास्तविक शक्ति बनती है।
इस पावन अवसर पर हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि धर्म केवल मंदिर और पूजा तक सीमित नहीं है। सेवा ही धर्म का जीवंत स्वरूप है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को अन्न देना, असहाय को सहयोग देना, गौसेवा करना, वृक्ष लगाना, जल का संरक्षण करना और समाज में सद्भाव स्थापित करना भी ईश्वर की आराधना के समान ही पवित्र भाव है।
श्रावण मास प्रकृति के नवजीवन का संदेश लेकर आता है। वर्षा से धरती हरित होती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। ऐसे में पुत्रदा एकादशी पर वृक्षारोपण, जलसंरक्षण और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेना हमारी सनातन जीवन-दृष्टि को कर्मरूप प्रदान करने जैसा है। प्रकृति की रक्षा वास्तव में आने वाली पीढ़ियों की रक्षा है।
मेरी दृष्टि में सनातन धर्म का सार ‘स्व’ से ‘समाज’ और ‘समाज’ से ‘राष्ट्र’ के कल्याण की भावना में निहित है। इसलिए इस पावन एकादशी पर भगवान श्रीहरि के श्रीचरणों में प्रार्थना करते हुए हमें अपने परिवार के साथ-साथ ग्राम, समाज और राष्ट्र के सुख, शांति एवं समृद्धि का भी संकल्प लेना चाहिए।
पुत्रदा एकादशी हमें यह संदेश देती है कि जीवन में श्रद्धा हो, पर श्रद्धा के साथ सदाचार भी हो; पूजा हो, पर पूजा के साथ सेवा भी हो; संतान की कामना हो, पर संतान के लिए संस्कारों का संकल्प भी हो; और व्यक्तिगत सुख की इच्छा हो, तो उसके साथ लोकमंगल की भावना भी हो।
इस पावन अवसर पर मैं भगवान श्रीहरि विष्णु के श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना करता हूँ—
हे जगत्पालक श्रीहरि!
समस्त प्राणियों के जीवन में सुख, शांति और मंगल प्रदान करें।
प्रत्येक परिवार को आरोग्य, समृद्धि एवं सद्भाव प्रदान करें।
हमारी संततियों को उत्तम संस्कार, सद्बुद्धि, विद्या, विनय और धर्मबोध प्रदान करें।
हमारे मन से अहंकार, द्वेष, मोह और अज्ञान का अंधकार दूर करें।
हमारे समाज में परस्पर प्रेम, भाईचारा और सेवा की भावना प्रबल करें।
हमारे ग्राम समृद्ध हों, हमारी धरती हरी-भरी हो और हमारा राष्ट्र निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥’
इसी मंगलभावना के साथ समस्त देशवासियों एवं श्रद्धालुजनों को श्रावण पुत्रदा एकादशी की हार्दिक, आध्यात्मिक एवं मंगलमय शुभकामनाएँ।
॥ श्रीहरिः शरणम् ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
