शहीद शिवराम हरि राजगुरु की जयंती पर विशेष लेख
-विवेक चन्द्र अवस्थी
“राष्ट्रीय अध्यक्ष” ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल संघर्षों और आंदोलनों का वृत्तांत नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों के त्याग, साहस और अमर बलिदान की गौरवगाथा है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। इन्हीं महान क्रांतिकारियों में एक तेजस्वी नाम है—शहीद शिवराम हरि राजगुरु। उनका जीवन राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का ऐसा उज्ज्वल अध्याय है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनके हृदय में देशप्रेम की लौ प्रज्वलित थी। अन्याय के प्रति उनका मन विद्रोह से भर उठता था और स्वतंत्र भारत का स्वप्न उनके जीवन का ध्येय बन चुका था। युवावस्था में वे क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई।
राजगुरु का नाम महान क्रांतिकारियों शहीद भगत सिंह और शहीद सुखदेव के साथ आदर और गौरव से लिया जाता है। इन तीनों युवाओं ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। उनके लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का विषय नहीं थी, बल्कि यह भारत के आत्मसम्मान, स्वाभिमान और राष्ट्रीय अस्मिता की पुनर्स्थापना का महान संकल्प था। उनके विचारों में देश सर्वोपरि था और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का कोई स्थान नहीं।
लाला लाजपत राय पर हुए निर्मम लाठीचार्ज और उसके परिणामस्वरूप उनके निधन ने देश के क्रांतिकारी युवाओं के अंतर्मन को झकझोर दिया। इस घटना ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के विरुद्ध उनके प्रतिरोध को और प्रखर बना दिया। राजगुरु, भगत सिंह और उनके साथियों ने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग चुना और स्वतंत्रता की लौ को जन-जन के हृदय तक पहुंचाने का प्रयास किया। अंततः ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया।
23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव को फांसी दे दी गई। वे आयु में भले ही युवा थे, किंतु उनके संकल्प हिमालय की तरह अडिग और उनका साहस समुद्र की तरह अथाह था। हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेने वाले इन अमर बलिदानियों ने यह सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रप्रेम वह शक्ति है, जिसके सामने मृत्यु भी छोटी प्रतीत होती है। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना में नई ऊर्जा और नई ज्वाला भर गया।
राजगुरु की जयंती केवल एक महान क्रांतिकारी को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। यह अवसर हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है कि राष्ट्र सर्वोपरि की भावना हमारे जीवन में कितनी गहराई से रची-बसी है। राजगुरु ने अपने जीवन से सिखाया कि देशभक्ति केवल नारों और शब्दों तक सीमित नहीं होती; वह त्याग, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रहित में किए गए कर्मों से अभिव्यक्त होती है।
आज भारत आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक प्रगति, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक सशक्तीकरण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में राजगुरु जैसे अमर क्रांतिकारियों के आदर्श हमारे लिए और भी अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। नई पीढ़ी को उनके जीवन से साहस, राष्ट्रनिष्ठा, अनुशासन, त्याग और कर्तव्यपरायणता की प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। उनके बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम अपने आचरण और कर्मों से राष्ट्र की प्रगति में योगदान दें।
शहीद शिवराम हरि राजगुरु की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
उनका अमर बलिदान भारत की आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्रसेवा, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा। उनका जीवन हमें याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त की हुई विरासत नहीं, बल्कि निरंतर सजगता, जिम्मेदारी और राष्ट्रनिष्ठा से सुरक्षित रखी जाने वाली अमूल्य धरोहर है।
