विशेष लेख | मेरी कलम से
✍️ विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
14 अगस्त भारतीय इतिहास के उस अत्यंत संवेदनशील और पीड़ादायक अध्याय की स्मृति का दिवस है, जब वर्ष 1947 में देश के विभाजन के परिणामस्वरूप लाखों नागरिकों को विस्थापन, हिंसा, असहनीय पीड़ा और अपनों से बिछड़ने की त्रासदी से गुजरना पड़ा। असंख्य परिवारों ने अपने घर-बार, संपत्ति और जीवन की संचित स्मृतियां पीछे छोड़कर अनिश्चित परिस्थितियों में पलायन किया।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस उन सभी नागरिकों के संघर्ष, धैर्य, त्याग और बलिदान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने उस कठिन कालखंड में अपार कष्ट सहन किए।
इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक भी है। विभाजन की पीड़ा हमें यह स्मरण कराती है कि सामाजिक अविश्वास, कटुता और वैमनस्य की परिस्थितियां मानव जीवन तथा सामाजिक व्यवस्था पर कितना गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि इतिहास का अध्ययन तथ्यों, संवेदनशीलता और संतुलित दृष्टिकोण के साथ किया जाए तथा नई पीढ़ी को उस दौर की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराया जाए।
विभाजन विभीषिका का स्मरण किसी वर्ग, समुदाय अथवा व्यक्ति के प्रति वैमनस्य उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अतीत की त्रासदी से सीख लेकर सामाजिक समरसता, परस्पर सम्मान, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को और सुदृढ़ करने के लिए होना चाहिए।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता है। विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और विचारों के बावजूद देश की अखंडता और राष्ट्रहित के प्रति साझा प्रतिबद्धता ही हमारी वास्तविक शक्ति है।
भारत में लोकतंत्र की जड़ें गांवों तक विस्तृत हैं। ग्राम पंचायतें केवल स्थानीय विकास और प्रशासन की संस्थाएं नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता, संवाद और समरसता को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। यदि ग्राम स्तर पर प्रत्येक नागरिक को समान सम्मान, सहभागिता और अवसर मिले तथा निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो, तो पंचायतें सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
सशक्त पंचायत, समरस समाज और जागरूक नागरिक—मजबूत एवं विकसित राष्ट्र की आधारशिला हैं।
विभाजन की त्रासदी को नई पीढ़ी तक पहुंचाना इसलिए आवश्यक है, ताकि युवा इतिहास से प्रेरणा और सीख लेकर भविष्य का निर्माण कर सकें। स्वतंत्रता के साथ मिली जिम्मेदारियों को समझना और देश की एकता, अखंडता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा शक्ति को सकारात्मक राष्ट्र निर्माण, सामाजिक सेवा और जनभागीदारी से जोड़ा जाए। यही प्रयास भारत को अधिक सशक्त, समावेशी और समरस राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
विभाजन की स्मृति हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि राष्ट्र की एकता, अखंडता, शांति और सामाजिक सद्भाव को सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।
हमारे विचार अलग हो सकते हैं, राजनीतिक अथवा सामाजिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रहित हम सभी का साझा दायित्व है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी में है कि विविधताओं के बीच संवाद, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान की भावना कायम रहे।
इस अवसर पर विभाजन की विभीषिका में प्राण गंवाने वाले सभी नागरिकों, विस्थापित परिवारों तथा उस कठिन दौर में असाधारण साहस और धैर्य का परिचय देने वाले लोगों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम यह संकल्प लें कि इतिहास की पीड़ा को विभाजन का कारण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की प्रेरणा बनाएंगे।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें, जहां मानवता सर्वोपरि हो, सामाजिक समरसता हमारी पहचान हो, लोकतांत्रिक मूल्य हमारी शक्ति हों और राष्ट्रीय एकता हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हो।
विभाजन की विभीषिका में प्राण गंवाने वाले सभी नागरिकों को शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
जय हिंद।
जय भारत।
