खाद्य सुरक्षा, पोषण संवर्धन एवं भूखमुक्त समाज के निर्माण का संकल्प
मेरी कलम से — विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन

विश्व खाद्य दिवस प्रत्येक वर्ष 16 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य विश्वभर में भूख, कुपोषण एवं खाद्य असुरक्षा जैसी गंभीर समस्याओं के प्रति जनजागरूकता उत्पन्न करना तथा प्रत्येक व्यक्ति को पर्याप्त, सुरक्षित एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की दिशा में सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की स्थापना की स्मृति में वर्ष 1981 से विश्व खाद्य दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस हमें खाद्य संसाधनों के महत्व, कृषि विकास, पोषण सुरक्षा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहने की प्रेरणा प्रदान करता है।

भोजन मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। पर्याप्त एवं पौष्टिक आहार का सीधा संबंध व्यक्ति के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता, मानसिक विकास तथा जीवन की गुणवत्ता से है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब वहाँ के नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीवनयापन के लिए आवश्यक भोजन उपलब्ध हो। आज भी विश्व के अनेक क्षेत्रों में भूख, कुपोषण और खाद्य असमानता की समस्या विद्यमान है। ऐसी परिस्थितियों में खाद्य सुरक्षा को केवल कृषि उत्पादन तक सीमित न रखकर सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा से जोड़कर देखना आवश्यक है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ कृषि एवं उससे संबंधित गतिविधियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार हैं। देश के किसान अपने परिश्रम, अनुभव और समर्पण से करोड़ों नागरिकों के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराते हैं। कृषि उत्पादन में उनका योगदान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के साथ-साथ देश की आर्थिक व्यवस्था को भी स्थायित्व प्रदान करता है। अतः किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य, सिंचाई के पर्याप्त साधन, गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक कृषि तकनीक, कृषि ऋण तथा प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है। किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार और कृषि को लाभकारी बनाने के लिए प्रभावी नीतियों का क्रियान्वयन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति तक उसकी सुलभ पहुँच तथा संतुलित एवं पौष्टिक आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, माताओं, बुजुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनबाड़ी सेवाओं, विद्यालयों में संचालित पोषण संबंधी कार्यक्रमों तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। साथ ही, योजनाओं के लाभ पात्र व्यक्तियों तक समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पहुँचें, इसके लिए संबंधित संस्थाओं को निरंतर प्रयास करना चाहिए।
ग्रामीण भारत में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए ग्राम पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंचायतीराज संस्थाएँ स्थानीय आवश्यकताओं की पहचान, पात्र परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने, पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाने तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। ग्राम सभा के माध्यम से स्थानीय समस्याओं पर चर्चा, जरूरतमंद परिवारों की सहायता तथा सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करके गांवों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण वाटिका, रसोई बागवानी, स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन और पौष्टिक आहार के प्रति जागरूकता जैसे प्रयास भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
वर्तमान समय में खाद्य पदार्थों की बर्बादी भी एक गंभीर सामाजिक एवं आर्थिक चुनौती है। विवाह समारोहों, सार्वजनिक आयोजनों, होटलों और घरेलू स्तर पर आवश्यकता से अधिक भोजन तैयार होने के कारण बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री व्यर्थ चली जाती है। दूसरी ओर, समाज के अनेक जरूरतमंद वर्ग पर्याप्त भोजन प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करते हैं। इस स्थिति में जनजागरूकता बढ़ाना, आवश्यकता के अनुरूप भोजन तैयार करना तथा सुरक्षित एवं उपयोग योग्य अतिरिक्त भोजन को उचित स्वच्छता मानकों के अंतर्गत जरूरतमंदों तक पहुँचाने की व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। अन्न का सम्मान करना केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय श्रम के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
खाद्य सुरक्षा का भविष्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ कृषि व्यवस्था पर भी निर्भर करता है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, बढ़ता तापमान तथा मिट्टी की उर्वरता में कमी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, फसल विविधीकरण तथा पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों को जल एवं भूमि संरक्षण से संबंधित गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए, ताकि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भावी पीढ़ियों के लिए भी पर्याप्त खाद्य संसाधन सुरक्षित रखे जा सकें।
खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में सरकार, प्रशासन, पंचायतीराज संस्थाओं, किसान संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और नागरिकों की सहभागिता आवश्यक है। योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, संसाधनों का उचित उपयोग तथा समाज के कमजोर वर्गों तक सहायता की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों को समन्वित रूप से कार्य करना चाहिए। ग्रामीण विकास की योजनाओं में पोषण, स्वच्छता, कृषि सुधार और आजीविका संवर्धन को समुचित महत्व देकर गांवों को अधिक आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का मानना है कि सशक्त पंचायतें, समृद्ध किसान और जागरूक नागरिक देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पंचायतों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जनजागरूकता, पोषण संवर्धन, खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकने तथा सरकारी योजनाओं के लाभ पात्र परिवारों तक पहुँचाने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना चाहिए। जनभागीदारी के माध्यम से ही ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा और पोषण संबंधी चुनौतियों का प्रभावी समाधान संभव है।
विश्व खाद्य दिवस हमें यह संदेश देता है कि भोजन का अधिकार, किसान का सम्मान और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता एक स्वस्थ एवं समावेशी समाज के महत्वपूर्ण आधार हैं। इस अवसर पर हम सभी को भूख और कुपोषण के उन्मूलन, कृषि विकास, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकने के लिए अपने स्तर पर सार्थक प्रयास करने का संकल्प लेना चाहिए।
मेरा विश्वास है कि जब प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध होगा, किसानों को उनके परिश्रम का उचित प्रतिफल मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा, तभी समावेशी विकास की अवधारणा वास्तविक रूप में साकार होगी। भूखमुक्त, कुपोषणमुक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का साझा दायित्व है।
आइए, विश्व खाद्य दिवस पर हम अन्न के सम्मान, किसान के सशक्तीकरण, पोषण सुरक्षा और भूखमुक्त समाज के निर्माण के लिए सामूहिक संकल्प लें।
अन्न का सम्मान करें, किसान का गौरव बढ़ाएँ और प्रत्येक व्यक्ति तक पौष्टिक भोजन पहुँचाने के प्रयासों में सहभागी बनें।
जय जवान, जय किसान!
जय पंचायत, जय भारत!
