पारदर्शी शासन, जवाबदेह प्रशासन और सशक्त नागरिकता की आधारशिला है सूचना का अधिकार
मेरी कलम से — विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
12 अक्टूबर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act) ने देश के आम नागरिक को शासन-प्रशासन से सवाल पूछने, सरकारी कार्यों की जानकारी प्राप्त करने तथा सार्वजनिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एक सशक्त कानूनी माध्यम प्रदान किया। इस ऐतिहासिक कानून की वर्षगांठ पर मैं समस्त देशवासियों एवं पंचायत प्रतिनिधियों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों की जागरूकता, शासन की जवाबदेही और सार्वजनिक कार्यों में पारदर्शिता से निर्धारित होती है। सूचना का अधिकार अधिनियम ने नागरिकों को यह विश्वास दिलाया कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है और सार्वजनिक धन से होने वाले कार्यों के संबंध में जानकारी प्राप्त करना उनका वैधानिक अधिकार है।
इस कानून को लागू करने में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लंबे जनआंदोलनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के संघर्ष और नागरिक समाज के प्रयासों ने भी इस कानून को साकार करने में अहम योगदान दिया। 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद यह अधिनियम 12 अक्टूबर 2005 से प्रभावी हुआ।
ग्रामीण भारत में सूचना का अधिकार विशेष महत्व रखता है। ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं, निर्माण कार्यों, लाभार्थियों के चयन, बजट, व्यय और सार्वजनिक सुविधाओं से संबंधित जानकारी नागरिकों के लिए अत्यंत आवश्यक है। जब ग्रामीण नागरिक जागरूक होकर अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं, तो विकास कार्यों की निगरानी मजबूत होती है, अनियमितताओं पर अंकुश लगाने में सहायता मिलती है और जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ती है।
हमारा मानना है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में पारदर्शी कार्यप्रणाली, अभिलेखों का उचित रखरखाव, नियमानुसार सूचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था और ग्राम सभा की सक्रियता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सूचना का अधिकार जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय, उत्तरदायी और जनहितकारी बनाने का माध्यम है।
सूचना का अधिकार तभी प्रभावी होगा, जब आम नागरिक अपने अधिकारों, आवेदन की प्रक्रिया और निर्धारित समय-सीमा के प्रति जागरूक होंगे। नागरिकों को चाहिए कि वे जनहित से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक और स्पष्ट जानकारी मांगें तथा प्राप्त सूचना का उपयोग रचनात्मक उद्देश्यों के लिए करें। साथ ही, संबंधित लोक प्राधिकारियों का दायित्व है कि वे कानून के प्रावधानों के अनुरूप समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराएं। जहां संभव और नियमानुसार आवश्यक हो, वहां सरकारी सूचनाओं का स्वप्रेरणा से सार्वजनिक प्रकटीकरण भी किया जाना चाहिए, ताकि नागरिकों को अनावश्यक रूप से आवेदन न करना पड़े।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का स्पष्ट मत है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी सशक्त पंचायतीराज व्यवस्था के मूल आधार हैं। संगठन ग्राम पंचायतों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, जागरूक और जनकेंद्रित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। संगठन का मानना है कि ग्रामीण विकास की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने, सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग और ग्राम सभा की प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करने में सूचना का अधिकार महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसके लिए नागरिक जागरूकता, संवैधानिक अधिकारों की जानकारी तथा जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच सकारात्मक संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस गांव का नागरिक जागरूक होगा, उस गांव का विकास अधिक पारदर्शी और जवाबदेह होगा।सूचना का अधिकार केवल कागज पर लिखा कानून नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और सुशासन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला है।
आइए, इस वर्षगांठ पर हम संकल्प लें कि सूचना के अधिकार का उपयोग जनहित, पारदर्शिता और सकारात्मक परिवर्तन के लिए करेंगे। हम ऐसा ग्रामीण भारत बनाने में योगदान देंगे, जहां सरकारी योजनाओं की जानकारी आम नागरिक तक पहुंचे, ग्राम सभा सशक्त बने और प्रत्येक सार्वजनिक कार्य में जवाबदेही सुनिश्चित हो।
सूचना का अधिकार — जागरूक नागरिक, पारदर्शी शासन और सशक्त लोकतंत्र का आधार।
सूचना का अधिकार अधिनियम की वर्षगांठ पर समस्त देशवासियों एवं पंचायत प्रतिनिधियों को हार्दिक शुभकामनाएं।
