!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

भारतीय सनातन संस्कृति में एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का विशेष अवसर माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी हमें सदाचार, करुणा, परोपकार और सत्कर्मों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
इस पावन अवसर पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण की कामना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और भक्तिभाव से किया गया व्रत मनुष्य को आत्मचिंतन तथा अपने आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देता है।
पद्मनाभं सुरेशं च विश्वाधारं जगद्गुरुम्।
भक्तानुग्रहकर्तारं वन्दे विष्णुं सनातनम्॥

इस पावन पर्व का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में सत्य, दया, ईमानदारी और सेवा को अपनाना भी है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, बुजुर्गों का सम्मान करना, गरीब परिवारों के साथ खड़े होना तथा समाज में प्रेम और सद्भाव बढ़ाना मानवता की सच्ची सेवा है।
गाँव हमारी सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला हैं। गाँवों में स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास करना हम सभी का दायित्व है। जब जनप्रतिनिधि और ग्रामवासी मिलकर जनकल्याण के लिए कार्य करते हैं, तभी समृद्ध और आत्मनिर्भर गाँवों का निर्माण संभव होता है।
आइए, इस पावन एकादशी पर हम संकल्प लें कि अपने विचारों को सकारात्मक, अपने व्यवहार को विनम्र और अपने कर्मों को जनकल्याण के प्रति समर्पित रखेंगे। आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और सहायता पहुँचाने का प्रयास करेंगे।
भगवान श्रीहरि विष्णु से प्रार्थना है कि सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और सद्बुद्धि का संचार हो। परिवारों में प्रेम, समाज में सद्भाव और राष्ट्र में एकता एवं समृद्धि बनी रहे।
आप सभी को पापांकुशा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
