जयंती विशेष
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती पर किया भावपूर्ण नमन
लखनऊ।
“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।”
यह केवल एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और कर्तव्यबोध का शाश्वत उद्घोष है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी ने पराधीन भारत में स्वतंत्रता का स्वप्न जगाया, समाज को उसकी सांस्कृतिक विरासत का बोध कराया और साहित्य को जनसेवा, राष्ट्रनिर्माण तथा सामाजिक जागरण का सशक्त माध्यम बनाया।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती पर ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन एवं संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि गुप्त जी केवल हिंदी के महान कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों के अमर गायक थे। उनकी लेखनी ने करोड़ों भारतीयों के मन में राष्ट्रप्रेम की ज्योति प्रज्वलित की और साहित्य को जन-जन के जीवन से जोड़ दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसके गाँवों, संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों में बसती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इन्हीं मूल्यों को अपनी रचनाओं के माध्यम से अमर कर दिया। उनकी कालजयी कृति ‘भारत-भारती’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जनमानस में आत्मगौरव, स्वदेश प्रेम और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उनकी कविताओं ने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि एक महान सांस्कृतिक राष्ट्र है।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिंदी साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक कवि थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। उनके अप्रतिम साहित्यिक योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1954 में देश के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी उनकी राष्ट्रनिष्ठ साहित्य साधना से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने उन्हें “राष्ट्रकवि” के रूप में संबोधित किया। वे स्वतंत्र भारत की राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे तथा राष्ट्रीय जीवन में साहित्य, संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों को समृद्ध बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।
उनकी अमर पंक्तियाँ—
“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”
आज भी आत्मचिंतन, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व और सामाजिक पुनर्जागरण का संदेश देती हैं। बदलते समय में भी ये शब्द उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि विकसित भारत का निर्माण तभी संभव है, जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे।
विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘जयद्रथ वध’ और ‘भारत-भारती’ जैसी कालजयी कृतियाँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नारी सम्मान, त्याग, कर्तव्य और राष्ट्रधर्म की जीवंत व्याख्या हैं। उनका संपूर्ण साहित्य आने वाली पीढ़ियों को नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और मानवता का मार्ग दिखाता रहेगा।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का यह दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का ‘राष्ट्रोदय का स्वप्न ग्रामोदय से ही साकार हो सकता है।’ महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और राष्ट्रकवि के राष्ट्रचिंतन का मूल भाव भी यही है कि जब गाँव शिक्षित, समृद्ध, आत्मनिर्भर और संस्कारित होंगे, तभी भारत सशक्त, विकसित और विश्वगुरु बनेगा। संगठन इसी संकल्प को लेकर पंचायतों के सशक्तीकरण, सामाजिक समरसता और जनभागीदारी के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
राष्ट्रकवि की प्रेरणादायी पंक्तियाँ—
“नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो।
जग में रहकर निज नाम करो।”
आज भी प्रत्येक युवा को कर्म, संघर्ष, आत्मविश्वास और राष्ट्रसेवा का संदेश देती हैं।
अंत में विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि साहित्य तब अमर होता है, जब वह केवल शब्दों तक सीमित न रहकर समाज की चेतना बन जाए। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी भारत की आत्मा की आवाज़ है, जो आने वाली अनंत पीढ़ियों तक राष्ट्रप्रेम, संस्कृति, कर्तव्य और मानवीय मूल्यों की अलख जगाती रहेगी।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन एवं मेरी ओर से राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। आइए, हम उनके आदर्शों, राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लें तथा ग्रामोदय से राष्ट्रोदय की भावना को साकार करने में अपना सक्रिय योगदान दें। यही राष्ट्रकवि के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“जयति संस्कृतिः, जयति साहित्यं, जयतु भारतम्।”
“राष्ट्रकवि की अमर वाणी युगों-युगों तक भारत की आत्मा को आलोकित करती रहेगी।”
