पुण्यतिथि विशेष
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का मंत्र देकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जनआंदोलन बनाने वाले युगपुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि
✍ विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक महान विभूतियों के अद्वितीय योगदान से आलोकित है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने केवल अंग्रेज़ी शासन का विरोध नहीं किया, बल्कि पराधीन भारत के जनमानस में आत्मसम्मान, राष्ट्रभक्ति और स्वराज की ऐसी चेतना जागृत की जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बना दिया। ऐसे युगपुरुषों में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी है।

उनकी पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों, आदर्शों और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को आत्मसात करने का दिवस है। तिलक जी का संपूर्ण जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, वैचारिक स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण से इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।
23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में जन्मे लोकमान्य तिलक बचपन से ही तेजस्वी, निर्भीक और स्वाभिमानी थे। उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त आधार समझा। इसी उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के विस्तार का अभियान चलाया और ऐसी पीढ़ी तैयार करने का प्रयास किया जो अपने राष्ट्र, संस्कृति और कर्तव्य के प्रति जागरूक हो।
लोकमान्य तिलक का सबसे बड़ा योगदान भारतीयों में स्वराज की चेतना जगाना था। उनका अमर उद्घोष—“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”—भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे प्रखर उद्घोष बना। इस एक वाक्य ने लाखों भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता किसी शासक की कृपा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैसर्गिक अधिकार है।
तिलक जी ने पत्रकारिता को भी राष्ट्रजागरण का सशक्त माध्यम बनाया। उनके समाचार पत्र ‘केसरी’ और ‘मराठा’ ने ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों का निर्भीकता से विरोध किया। उनकी लेखनी में राष्ट्र का दर्द था, समाज की चेतना थी और स्वतंत्रता का आह्वान था। उन्होंने कलम को जनशक्ति का प्रतीक बनाया और सिद्ध किया कि विचारों की शक्ति किसी भी साम्राज्य से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
भारतीय संस्कृति और परंपरा को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का उनका प्रयास भी अद्वितीय था। उन्होंने सार्वजनिक गणेश उत्सव और शिवाजी महोत्सव को सामाजिक एकता और राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बनाया। इन आयोजनों ने समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया और स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लोकमान्य तिलक का जीवन त्याग, संघर्ष और अदम्य साहस का पर्याय है। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अनेक बार कारावास दिया, किन्तु वे कभी विचलित नहीं हुए। मांडले जेल में रहते हुए उन्होंने ‘गीता रहस्य’ जैसा कालजयी ग्रंथ लिखकर कर्मयोग, कर्तव्य और राष्ट्रधर्म का संदेश दिया। उन्होंने भारतीय समाज को सिखाया कि कठिन परिस्थितियाँ महान व्यक्तित्वों को और अधिक दृढ़ बनाती हैं।
आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे समय में लोकमान्य तिलक के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, नागरिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक गौरव—ये सभी उनके चिंतन के आधार स्तंभ थे। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से सजग होगा।
लोकमान्य तिलक का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। उनका स्वराज ऐसा भारत था जहाँ समाज शिक्षित हो, नागरिक जागरूक हों, प्रशासन उत्तरदायी हो और अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचे। यही विचार आज पंचायती राज व्यवस्था और ग्राम स्वराज की मूल भावना में भी दिखाई देता है। सशक्त ग्राम पंचायतें, जनभागीदारी, पारदर्शी प्रशासन और आत्मनिर्भर गाँव ही सशक्त भारत की वास्तविक नींव हैं।
आज जब पंचायती राज संस्थाएँ ग्रामीण विकास की धुरी बनी हुई हैं, तब लोकमान्य तिलक के विचार हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति गाँवों में बसती है। यदि ग्राम पंचायतें सशक्त होंगी, स्थानीय नेतृत्व ईमानदार और जवाबदेह होगा तथा जनता विकास में सहभागी बनेगी, तभी राष्ट्र सर्वांगीण प्रगति की ओर अग्रसर होगा।
युवा पीढ़ी के लिए लोकमान्य तिलक का जीवन प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। उन्होंने सिखाया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र सेवा की भावना का विकास होना चाहिए। आज के युवाओं को उनके साहस, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा से प्रेरणा लेकर भारत को ज्ञान, विज्ञान, नवाचार, सुशासन और नैतिक नेतृत्व के क्षेत्र में विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेना चाहिए।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन और व्यवहार में उतारने से होगी। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना, लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाना, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना, ग्राम स्वराज की भावना को मजबूत करना और विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाना ही उनके प्रति हमारी वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।
आइए, इस पुण्य अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के स्वराज, स्वाभिमान, राष्ट्रवाद, कर्तव्यपरायणता और लोकसेवा के आदर्शों को अपने जीवन का पथप्रदर्शक बनाएँगे तथा एक सशक्त, समृद्ध, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में अपना पूर्ण योगदान देंगे। यही राष्ट्रऋषि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
