एक ग्रामीण पिता का दर्द, एक माँ की मौन चीख
विशेष लेख | विवेक चन्द्र अवस्थी
देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर वर्षों से लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रतीक रहा है। जब भी देश का कोई वर्ग अपनी पीड़ा, अपेक्षाएँ या अधिकारों की बात कहना चाहता है, तो उसकी आवाज़ अक्सर जंतर-मंतर तक पहुँचती है। हाल की घटना ने केवल वहाँ मौजूद लोगों को ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ के गाँवों में रहने वाले उन लाखों परिवारों को भी भीतर तक व्यथित किया है, जिनकी उम्मीदें अपने बच्चों के भविष्य से जुड़ी हैं।
आज मेरी कलम किसी राजनीतिक पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि उस ग्रामीण भारत की पीड़ा लिख रही है, जिसने अपने बच्चों के सपनों के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। जब किसी नौजवान की आँखों में निराशा दिखाई देती है, तो उसका दर्द केवल उसी का नहीं होता, बल्कि उसके पूरे परिवार और गाँव का दर्द बन जाता है।
गाँव का किसान पिता सुबह सूरज निकलने से पहले खेत में पहुँचता है। वह अपनी थकान, अपनी इच्छाएँ और अपने सपने इसलिए भूल जाता है कि उसका बेटा या बेटी उससे बेहतर जीवन जी सके। वह चाहता है कि अगली पीढ़ी को वह संघर्ष न करना पड़े जो उसने जीवन भर किया। यही सोचकर वह कर्ज लेता है, जमीन गिरवी रखता है, अपनी जरूरतों को टाल देता है और बच्चों की पढ़ाई पर सब कुछ न्योछावर कर देता है।
दूसरी ओर, एक ग्रामीण माँ अपने बच्चे की सफलता के लिए अनगिनत त्याग करती है। कई बार वह अपने हिस्से का भोजन बच्चों के लिए छोड़ देती है, हर परीक्षा से पहले ईश्वर के सामने दीप जलाकर प्रार्थना करती है और हर दिन इस विश्वास के साथ जीती है कि उसका बेटा एक दिन उसके संघर्ष का सम्मान लौटाएगा।
ऐसे में जब वही युवा किसी घटना के बाद निराश, व्यथित या आहत दिखाई देता है, तो सबसे गहरा घाव उसके माता-पिता के हृदय पर लगता है। उनकी वर्षों की तपस्या, त्याग और उम्मीदें जैसे एक पल में प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं।
देश का ग्रामीण नौजवान केवल रोजगार नहीं चाहता। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का सम्मान हो, उसकी बात सुनी जाए और उसे यह भरोसा मिले कि लोकतंत्र में उसकी आवाज़ का मूल्य है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। जब संवाद कमजोर पड़ता है, तो केवल असहमति ही नहीं बढ़ती, बल्कि विश्वास भी कमजोर होने लगता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज और शासन मिलकर ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ हर युवा अपनी बात शांति, गरिमा और विश्वास के साथ रख सके। असहमति को संवाद से, पीड़ा को संवेदनशीलता से और समस्याओं को न्यायपूर्ण समाधान से संबोधित किया जाए। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही भारत की सबसे बड़ी ताकत भी।
आज मेरी प्रार्थना किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है। ईश्वर करे कि किसी ग्रामीण माँ की आँखों में अपने बच्चे के भविष्य को लेकर भय न हो, किसी किसान पिता को अपने बेटे के सपनों पर संदेह न करना पड़े और कोई भी युवा स्वयं को अकेला या उपेक्षित महसूस न करे।
भारत का भविष्य गाँवों से निकलने वाले उन्हीं युवाओं के कंधों पर है, जिनके सपनों में परिवार की उम्मीदें और राष्ट्र के विकास की संभावनाएँ बसती हैं। यदि उनके मन में विश्वास बना रहेगा, तो भारत का भविष्य भी मजबूत रहेगा।
आज मेरी कलम किसी के विरुद्ध नहीं चली है।
यह केवल उन लाखों ग्रामीण परिवारों के साथ खड़ी है, जिनकी आँखों में अभी भी अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की एक किरण जीवित है।
