मजबूत पंचायतें ही विकसित भारत का आधार
— विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति संसद और विधानसभाओं के साथ-साथ ग्राम पंचायतों में भी निहित है। संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देकर स्थानीय स्वशासन की नई दिशा अवश्य दी, किंतु तीन दशक बाद भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या पंचायतें वास्तव में उतनी सक्षम हो सकी हैं, जितनी परिकल्पना की गई थी?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर एक तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है—पंचायतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाएँ हैं। जब एक साधारण विकास कार्य के लिए कई स्तरों की स्वीकृतियाँ, लंबी कागजी औपचारिकताएँ और विभागीय समन्वय की कठिनाइयाँ सामने आती हैं, तब विकास की गति स्वतः धीमी पड़ जाती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव ग्रामीण नागरिकों पर पड़ता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन की प्रत्येक व्यवस्था नागरिक-केंद्रित हो। नियम सरल हों, प्रक्रियाएँ समयबद्ध हों, तकनीक का अधिकतम उपयोग हो और निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी बने। प्रशासनिक सरलीकरण केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सुशासन की मूल शर्त है। जितनी सरल व्यवस्था होगी, उतनी ही अधिक जवाबदेही, पारदर्शिता और जनविश्वास विकसित होगा।
पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन भुगतान, भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण और पंचायतों में डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार जैसे अनेक सकारात्मक प्रयास हुए हैं। इन पहलों ने ग्रामीण प्रशासन को नई दिशा दी है। अब अगला चरण यह होना चाहिए कि प्रत्येक ग्राम पंचायत डिजिटल रूप से सक्षम, तकनीकी रूप से प्रशिक्षित और प्रशासनिक रूप से आत्मनिर्भर बने।
पंचायतों को केवल अधिकार और बजट देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह भी है कि उन अधिकारों के प्रयोग की प्रक्रिया सरल हो। ग्राम प्रधान और पंचायत प्रतिनिधि अपना अधिक समय विकास कार्यों में दें, न कि अनावश्यक औपचारिकताओं में। यदि प्रशासनिक ऊर्जा फाइलों के बजाय विकास योजनाओं पर खर्च होगी तो उसका लाभ सीधे ग्रामीण समाज को मिलेगा।
सरलीकरण का अर्थ नियमों में शिथिलता नहीं है। इसका उद्देश्य नियमों को स्पष्ट, पारदर्शी और प्रभावी बनाना है, ताकि ईमानदारी से कार्य करने वाले जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े तथा भ्रष्टाचार और विलंब की संभावनाएँ स्वतः कम हों।
आज विकसित भारत के लक्ष्य की चर्चा पूरे देश में हो रही है। इस लक्ष्य की सफलता तभी संभव है जब देश की छह लाख से अधिक बस्तियाँ और ढाई लाख से अधिक ग्राम पंचायतें विकास की मुख्यधारा में समान गति से आगे बढ़ें। मजबूत पंचायतें ही मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण करेंगी, और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक पहचान बनेगी।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का स्पष्ट मत है कि पंचायतों का भविष्य “सरलीकरण से सशक्तीकरण” की नीति में निहित है। यदि शासन व्यवस्था सरल, पारदर्शी, तकनीक-सक्षम और उत्तरदायी बनेगी, तो पंचायतें केवल प्रशासनिक इकाई नहीं रहेंगी, बल्कि ग्रामीण परिवर्तन की सबसे प्रभावी शक्ति बनकर उभरेंगी।
आज समय की मांग है कि सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें, जहाँ प्रक्रियाएँ सरल हों, निर्णय त्वरित हों और प्रत्येक ग्राम पंचायत विकास का आत्मविश्वासी केंद्र बने।
जब व्यवस्था सरल होगी, तभी पंचायत सशक्त होगी; और जब पंचायत सशक्त होगी, तभी विकसित भारत का सपना साकार होगा।
