प्रारंभिक जांच के आधार पर सरचार्ज नहीं लगाया जा सकता, धारा-27 के तहत विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाना होगी — हाईकोर्ट
लखनऊ। ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन को पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक और महत्वपूर्ण न्यायिक सफलता मिली है। संगठन की प्रदेश सचिव एवं पूर्व ग्राम प्रधान श्रीमती सपना चतुर्वेदी द्वारा दाखिल याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए प्रारंभिक जांच के आधार पर पारित सरचार्ज एवं वसूली के आदेशों को निरस्त कर दिया है।

माननीय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने रिट-सी संख्या 24625/2026 (सपना चतुर्वेदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) में 4 अगस्त 2026 को दिए गए निर्णय में स्पष्ट किया कि केवल प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर किसी ग्राम प्रधान के विरुद्ध सरचार्ज एवं रिकवरी की कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा-27 एवं नियम-258 के अंतर्गत निर्धारित स्वतंत्र एवं वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
निर्णय में न्यायालय ने सरचार्ज एवं वसूली के आदेश निरस्त करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार आवश्यक समझे तो वह कानून के अनुरूप नई कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होगी।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विवेक चन्द्र अवस्थी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह केवल श्रीमती सपना चतुर्वेदी की व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों ग्राम प्रधानों एवं पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा करने वाला ऐतिहासिक निर्णय है। उन्होंने कहा कि यह फैसला सुनिश्चित करता है कि किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के विरुद्ध आर्थिक दायित्व तय करने से पहले विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पूर्ण पालन किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि संगठन शुरू से ही पंचायत प्रतिनिधियों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत है और भविष्य में भी अन्याय के विरुद्ध कानूनी एवं लोकतांत्रिक लड़ाई जारी रखेगा। यह निर्णय पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता, न्याय और विधि के शासन को और अधिक मजबूत करेगा।
विवेक चन्द्र अवस्थी ने कहा कि यह निर्णय ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन के न्याय, अधिकार और पंचायत सशक्तीकरण के संकल्प को नई मजबूती प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
