मिट्टी से सृस्टि तक …
खेत से खलिहान तक, हर सफर में इनका हाथ है; गाँव के हर विकास में, इन्हीं की बात है!
मेरी कलम से — विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई!

ग्रामीण भारत की पहचान उसकी कृषि, संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक जीवन से है, और इन सभी के केंद्र में ग्रामीण महिलाओं का अतुलनीय योगदान निहित है। खेतों में बीज बोने से लेकर फसल की कटाई, अनाज की सफाई, पशुपालन, परिवार के पोषण और बच्चों के भविष्य के निर्माण तक ग्रामीण महिलाएँ निरंतर अपनी भूमिका निभाती हैं। उनका श्रम केवल परिवार की आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास को भी मजबूती प्रदान करता है।

अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 15 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के योगदान को पहचान देना, उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा कृषि, आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और निर्णय प्रक्रिया में उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। ग्रामीण महिलाओं का सशक्तीकरण केवल महिला विकास का विषय नहीं, बल्कि समावेशी ग्रामीण विकास और राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है।
भारत के गाँवों में महिलाएँ कृषि कार्यों की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं। वे खेतों में निराई-गुड़ाई, बुवाई, कटाई, अनाज के भंडारण और पशुधन की देखभाल जैसे अनेक कार्यों में योगदान देती हैं। इसके अतिरिक्त, वे घर-परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए बच्चों के पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल तथा पारिवारिक संसाधनों के प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इतनी व्यापक जिम्मेदारियों के बावजूद उनके श्रम और योगदान को कई बार वह सामाजिक एवं आर्थिक पहचान नहीं मिल पाती, जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी हैं।
ग्रामीण महिला का जीवन परिश्रम, धैर्य, आत्मसम्मान और संघर्ष का प्रतीक है। सीमित संसाधनों, सामाजिक चुनौतियों तथा शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी के बावजूद ग्रामीण महिलाएँ अपने परिवार और समाज को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि उनके श्रम को केवल पारिवारिक दायित्व मानकर न देखा जाए, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की प्रगति में उनके महत्वपूर्ण योगदान को उचित सम्मान दिया जाए।
ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए स्वयं सहायता समूह, कौशल विकास, स्वरोजगार, कृषि आधारित उद्यम, लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, दुग्ध उत्पादन और स्थानीय उत्पादों के विपणन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। महिलाओं को वित्तीय साक्षरता, डिजिटल तकनीक, आधुनिक कृषि पद्धतियों और बाजार तक पहुँच के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इससे वे अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभावी योगदान दे सकेंगी।
ग्रामीण महिला सशक्तीकरण में पंचायतीराज संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत आधार प्रदान किया। ग्राम पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने स्थानीय शासन में महिलाओं के नेतृत्व और सहभागिता के नए अवसर विकसित किए हैं। अब आवश्यकता है कि महिला प्रतिनिधियों को पंचायत संबंधी कानूनों, वित्तीय प्रबंधन, सरकारी योजनाओं, डिजिटल प्रशासन और विकास नियोजन का पर्याप्त प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने और अपने क्षेत्र की विकास संबंधी आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम बन सकें।
ग्राम सभा और पंचायत की बैठकों में ग्रामीण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। पेयजल, स्वच्छता, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, महिला सुरक्षा और बाल विकास जैसे विषयों पर महिलाओं के अनुभव और सुझाव स्थानीय विकास योजनाओं को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। महिला नेतृत्व को प्रोत्साहन देने से पंचायतों में जवाबदेही, जनभागीदारी और समावेशी विकास की भावना मजबूत होती है।
ग्रामीण महिलाओं के समक्ष शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, पोषण, सुरक्षित आवागमन, स्वच्छ पेयजल, रोजगार तथा डिजिटल संसाधनों तक पहुँच जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार, प्रशासन, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को समन्वित प्रयास करने चाहिए। बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना, महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान देना, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एवं भेदभाव के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
ग्रामीण विकास की वास्तविक अवधारणा तभी पूरी हो सकती है, जब विकास की प्रत्येक योजना में महिलाओं की आवश्यकताओं, अनुभवों और आकांक्षाओं को उचित स्थान मिले। गाँवों में सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार संबंधी सुविधाओं के विस्तार के साथ महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में सहभागी बनाना आवश्यक है। ग्रामीण महिला केवल विकास योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की योजनाकार, कार्यान्वयन में सहभागी और परिवर्तन की महत्वपूर्ण नेतृत्वकर्ता भी है।
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन का मानना है कि ग्रामीण महिलाओं का सम्मान, सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता मजबूत किए बिना समृद्ध एवं आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सकता। संगठन ग्रामीण महिलाओं के योगदान को सम्मान देने, पंचायतों में उनकी प्रभावी भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में समान अवसरों और सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत करने के महत्व पर बल देता है।
आज अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के अवसर पर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि खेत से खलिहान तक, पशुपालन से ग्रामीण उद्यम तक और परिवार के निर्माण से पंचायत के नेतृत्व तक महिलाओं का योगदान सर्वव्यापी है। उनके श्रम का सम्मान, उनके अधिकारों की रक्षा और उनकी प्रतिभा को अवसर प्रदान करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस दिन ग्रामीण महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, सामाजिक रूप से सम्मानित, शैक्षिक रूप से सशक्त और राजनीतिक रूप से प्रभावी होगी, उस दिन गाँवों के विकास को नई दिशा और नई गति प्राप्त होगी। ग्रामीण महिला की प्रगति ही ग्रामीण समाज की प्रगति है, और ग्रामीण समाज की समृद्धि ही राष्ट्र की समृद्धि का आधार है।
खेत से खलिहान तक, हर सफर में इनका हाथ है,
गाँव के हर विकास में, इन्हीं की बात है!
आइए, इस अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस पर हम संकल्प लें कि ग्रामीण महिलाओं के परिश्रम को सम्मान देंगे, उनके अधिकारों की रक्षा करेंगे, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के अवसर उपलब्ध कराने में सहयोग करेंगे और पंचायत से लेकर राष्ट्र निर्माण तक उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास करेंगे।
ग्रामीण नारी का सम्मान — सशक्त गाँव की पहचान।
सशक्त महिला, सशक्त पंचायत — समृद्ध भारत का संकल्प।
अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
विवेक चन्द्र अवस्थी
राष्ट्रीय अध्यक्ष
ग्रामीण सत्ता पंचायतीराज संगठन
